• नये मिजाज, नये अंदाज की कहानियां

    इक्कीसवीं सदी में जिन कथाकारों ने अपने अलहदा कथ्य, भाषा शैली और शिल्प से हिंदी कथा साहित्य में एक जुदा पहचान बनाई

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    - ज़ाहिद ख़ान

    'जख़्म-ए-कुहन' एक मासूम बच्चे सुंदर के माफ़र्त समाज में ख़त्म होती संवेदनशीलता और पर्यावरण के सवालों को प्रमुखता से उठाती है। इस कहानी की ख़ामी की यदि बात करें, तो अनावश्यक विस्तार है। 'क़ातिल की बीवी' और 'रात की बारहखड़ी' इन दोनों ही कहानियों में लेखक ने ''आदमी क्यों अपराध करता है ?'', ''अपराध के पीछे की क्या मनोस्थिति होती है ?'' इसकी शिनाख़्त की है। 'क़ातिल की बीवी' में समाज के निम्न वर्ग का लेखक ने बड़े ही यथार्थवादी तरीके से चित्रण किया है। इस वर्ग की समस्याएं, परेशानियां और ज़रूरतें एक समान हैं। अपने पति की मौत के बाद भी ज़रीना, क़ातिल की बीवी राधा से तर्क-ए-तअल्लुक नहीं करती। क्योंकि, ज़रीना की नज़र में उसके पति की मौत की ज़िम्मेदार राधा नहीं है। क़त्ल के बाद से ही राधा का पति फ़रार है और उसकी ज़िंदगी भी ज़रीना की ज़िंदगी की तरह बदहाल व सूनी है। औरों से ज़्यादा, एक-दूसरे के दु:ख-दर्द को वे ही बेहतर समझती हैं।

    कहानी संग्रह 'प्रलय में नाव', 'आधार प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ है। थोड़े से ही अरसे में इस प्रकाशन ने प्रकाशन जगत में अपना एक अलग मुक़ाम बनाया है। हिंदी के तमाम चर्चित कथाकारों की किताबें 'आधार' से ही आईं या आ रही हैं। कहानियों के कथ्य, शिल्प, भाषाशैली और उसके निर्वहन से इतर यदि किताब के प्रोडक्शन के बारे में बात करें, तो किताब को पढ़ने के बाद यह लगता है कि इसकी सही तरह से प्रूफ रीडिंग नहीं हुई है। वर्तनी की ग़ल्तियां तो हैं ही, नुक्ते भी सिरे से ग़ायब हैं। जबकि लेखक तरुण भटनागर ने अपनी इन कहानियों में उर्दू अल्फ़ाज़ का इफ़रात में इस्तेमाल किया है।

    इक्कीसवीं सदी में जिन कथाकारों ने अपने अलहदा कथ्य, भाषा शैली और शिल्प से हिंदी कथा साहित्य में एक जुदा पहचान बनाई, उनमें तरुण भटनागर का नाम सबसे अव्वल नंबर पर है। रवीन्द्र कालिया के संपादन में 'वागर्थ' के 'युवा कहानी विशेषांक' से उन्होंने कथा साहित्य की शुरुआत की। तब से वे लगातार साहित्य सृजन कर रहे हैं। इस दरमियान उनके तीन कहानी संग्रह 'गुलमेंहदी की झाड़ियां', 'भूगोल के दरवाजे पर', 'जंगल में दपर्ण' और इतने ही उपन्यास 'लौटती नहीं जो हंसी', 'राजा, जंगल और काला चांद', 'बेदावा' प्रकाशित हो चर्चा में आ चुके हैं। 'प्रलय में नाव' तरुण भटनागर का चौथा कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी आठ कहानियां संकलित हैं। सभी कहानियां एक-दूसरे से पूरी तरह अलग। न सिफ़र् कथ्य के स्तर पर, बल्कि भाषा शैली और शिल्प के लिहाज़ से भी।

    'जंगल में चोरी', बस्तर के एक ऐसे गांव की कहानी है, जहां अभावग्रस्तता के बीच भी आदिवासी समुदाय हर तरह के अपराध से दूर रहता है। 'चोरी' क्या शै है ?, उसे नहीं मालूम। कहानी के अहम किरदार मंधा और सोमारु को जब ठंड लगती है, तो वे गोदाम से सीमेंट की बोरी का सीमेंट निकालकर, बोरे ले जाते हैं। ठेकेदार इस बात की पुलिस में रिपोर्ट लिखवा देता है। पुलिसवाला जब मामले की तफ़तीश करने आता है, तो वह ठेकेदार से कहता है, ''बोरी की चोरी, चोरी नहीं है।'' इस छोटी सी कहानी में लेखक ने आदिवासी समाज का भोलापन, गरीबी और उनका शोषण दिखाया है। चहुंओर शोषण के बीच भी कहीं न कहीं उनकी मासूमियत बची हुई है।

    'जख़्म-ए-कुहन' एक मासूम बच्चे सुंदर के माफ़र्त समाज में ख़त्म होती संवेदनशीलता और पर्यावरण के सवालों को प्रमुखता से उठाती है। इस कहानी की ख़ामी की यदि बात करें, तो अनावश्यक विस्तार है। 'क़ातिल की बीवी' और 'रात की बारहखड़ी' इन दोनों ही कहानियों में लेखक ने ''आदमी क्यों अपराध करता है ?'', ''अपराध के पीछे की क्या मनोस्थिति होती है ?'' इसकी शिनाख़्त की है। 'क़ातिल की बीवी' में समाज के निम्न वर्ग का लेखक ने बड़े ही यथार्थवादी तरीके से चित्रण किया है। इस वर्ग की समस्याएं, परेशानियां और ज़रूरतें एक समान हैं। अपने पति की मौत के बाद भी ज़रीना, क़ातिल की बीवी राधा से तर्क-ए-तअल्लुक नहीं करती। क्योंकि, ज़रीना की नज़र में उसके पति की मौत की ज़िम्मेदार राधा नहीं है। क़त्ल के बाद से ही राधा का पति फ़रार है और उसकी ज़िंदगी भी ज़रीना की ज़िंदगी की तरह बदहाल व सूनी है।

    औरों से ज़्यादा, एक-दूसरे के दु:ख-दर्द को वे ही बेहतर समझती हैं। लेखक ने इस कहानी में संवेदना और मनुष्यता के उच्च शिखर को छुआ है। कहानी 'महारानी एक्सप्रेस' कई स्तरों पर एक साथ चलती है। इसमें विस्थापन से जुड़े सवाल हैं, तो आदिवासियों के जीवन की दारुण स्थितियां भी। कहानी की मुख्य पात्र 'तारा' किस तरह से दो भाईयों के बीच मतभेदों को दूर कर, उनकी जिंदगी में नई रोशनी लाती है, यह कहानी का केन्द्रीय विचार है। ''हम दुनिया की फिकर करते हैं, पर अपने ही नहीं दिखते। अपनों से ही खीजते हैं, नहीं बांटना चाहते अपना दु:ख और अपनी खुशी अपनों के साथ ही।'' (पेज-56) तरुण भटनागर अपनी कहानियों में संवादों का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। अक्सर सघन दृश्यों के माध्यम से ही उनकी कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन जो भी संवादों का प्रयोग वे करते हैं, उनमें गहरी अर्थवत्ता होती है।

    शीर्षक कहानी 'प्रलय में नाव', संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। जो साहित्यिक जगत में काफी चर्चा में रही। यह आख्यानपरक कहानी है। मिथक और इतिहास की अहम घटनाओं के जरिए लेखक ने इसमें इंसानी फ़ितरत और लालच को दर्शाया है। कहानी की शुरुआत बड़े ही रहस्यात्मक तरीके से होती है। ''वह न तो नूह था और न ही मनु, पर वह नाव बना रहा था। प्रलय होने में अभी देर थी।''(पेज-58) बहरहाल, तमाम ऐतिहासिक घटनाक्रमों से गुज़रते हुए यह कहानी आगे बढ़ती है। कहानी के अंत तक पाठक की इसमें दिलचस्पी बनी रहती है। अंत बड़ा ही मार्मिक बन पड़ा है। तमाम कोशिशों के बाद भी वह आदमी अपने लक्ष्य में कामयाब नहीं हो पाता। बड़ी सी नाव बना लेने के बाद भी, इंसान पर भरोसे की कीमत, वह सृष्टि के विनाश के रूप में चुकाता है। कहानी का संदेश स्पष्ट है कि दुनिया में जब भी कभी प्रलय होगी, तो वह इंसानी लालच की वजह से ही होगी। आदमी ने अब भी अपनी हवस और लालच पर काबू नहीं पाया, तो दुनिया एक दिन तबाह हो जायेगी। जिसके लिए वह खु़द जिम्मेदार होगा।

    तरुण भटनागर अमूमन अपनी सभी कहानियां सूक्ष्म ब्यौरों से बुनते हैं। इन ब्यौरों से कई बार उनकी कहानी की स्टोरी लाइन दब सी जाती है। 'तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड', छीजते जा रहे मानवीय मूल्यों और इंसानियत को बचा लेने के जद्दोजहद की कहानी है। इस कहानी का बैकग्राउंड विदेशी है। एक बुजुर्ग औरत क्रिस्टीना को बचाने के लिए नौजवान स्टीव किस तरह जतन करता है, यह कहानी में दिलचस्प तरीके से आया है। वृद्धावस्था का एकाकीपन और रिश्तों में आ रही दूरियों को भी लेखक ने इसमें बड़ी ही प्रभावशीलता से दर्शाया है।

    कहानी में जिस तरह के चित्र बनते-उभरते हैं, कमोबेश वे आज हमारे देश के महानगरों में भी दिखाई देते हैं। रोज-ब-रोज मीडिया में इस तरह की ख़बरें आती रहती हैं कि ''अपने फ्लैट में वृद्ध दंपत्ति मृत पाये गए। मौत के समय, उनके पास कोई मौजूद नहीं था।'' 'चित्र पर थरथराती उंगलियां' संग्रह की आख़िरी कहानी है। यह कहानी किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं करती। अलबत्ता इस छोटी सी कहानी में लेखक ने श्लील-अश्लील बहस को निरर्थक बताया है।

    कहानी संग्रह 'प्रलय में नाव', 'आधार प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ है। थोड़े से ही अरसे में इस प्रकाशन ने प्रकाशन जगत में अपना एक अलग मुक़ाम बनाया है। हिंदी के तमाम चर्चित कथाकारों की किताबें 'आधार' से ही आईं या आ रही हैं। कहानियों के कथ्य, शिल्प, भाषाशैली और उसके निर्वहन से इतर यदि किताब के प्रोडक्शन के बारे में बात करें, तो किताब को पढ़ने के बाद यह लगता है कि इसकी सही तरह से प्रूफ रीडिंग नहीं हुई है। वर्तनी की ग़ल्तियां तो हैं ही, नुक्ते भी सिरे से ग़ायब हैं। जबकि लेखक तरुण भटनागर ने अपनी इन कहानियों में उर्दू अल्फ़ाज़ का इफ़रात में इस्तेमाल किया है।

    किताब में लेखक का परिचय भी नदारद है। हो सकता है, प्रकाशक का यह कोई नया प्रयोग हो। पर इस तरह के प्रयोगों से बचना चाहिए। नया पाठक जब भी कोई किताब पढ़ता है, तो वह लेखक के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहता है। गोकि शोध कर रहे छात्रों के लिए भी यह ज़रूरी होता है। यही नहीं किताब के फॉन्ट भी अपेक्षाकृत काफ़ी छोटे हैं। जिससे पढ़ने में परेशानी पेश आती है। कुल जमा कहानी संग्रह 'प्रलय में नाव' में शामिल ज़्यादातर कहानियां, नये मिज़ाज और नये अंदाज़ की कहानियां हैं। तरुण भटनागर ने इन कहानियों में मानवीय संवेदनाओं को नया अर्थ प्रदान किया है। पाठक इन्हें ज़रूर पसंद करेंगे।

    प्रलय में नाव', लेखक : तरुण भटनागर, मूल्य : 150 (पेपरबैक संस्करण), प्रकाशक : आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा)

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